Thursday, 25 April 2013

प्रयास

क्या?इंग्लैंड का अनपढ चरवाहा,अंग्रेजी बोलने से विद्वान हो जाता है।
यदि नहीं तो फिर क्यों भारत में,पढ़ालिखा हिंदी में अंग्रेजी मिलाता है.
क्या अंग्रेजी के दो शब्द बोलकर ही,हम समझदार शभ्य बन जाते है।
यदि नहीं तो फिर क्योंकरहम,मातृभाषा का शब्दकोष मिटाते जाते है।
माना जानकारी अरु बाहर संबाद को,आजकल अंग्रेजी जाननाजरुरीहै। मगर समझ नहीं आता मातृभाषा को,बर्वाद करने की क्या मजबूरी है.
हमारे भारत में ही अनगिनत भाषाए,अति प्राचीन काल से ही मौजूदहै। मगर आज आधुनिक भारतवर्ष में तो,घर में भी अंग्रेजी का ही वजूद है। सरकारी तंत्र तो कई मायनों में आजभी,अंग्रेजियत का ही गुलाम है। छ्यासाठ साल हो गए विमुक्त हुये,कलेक्टर का बदल न सके नाम है।
अगर हमें अपने बचाना है संस्कार,तो मातृभाषा को पहले बचाना होगा। अंग्रेजी का खूब अध्ययन करके भी,घरमें मातृभाषा में ही बतियाना होगा।  

2 comments:

Dev Nischal said...

Rubbish- what do you want to say?

bharadwajgwalior.blogspot.com said...

i want to say we must be love our culture. we will use other language as necessity not as our status symbol. our mother is also status symbol for us.