Sunday, 27 January 2013

आत्मचिन्तन

दोष दूसरो को  देकर हम, खुद सुधर तो सकते नहीं।
जब तक अपने अंतर्मन में,झांक कर तकते नहीं।
कितने लचीले बना लिए है,हमने अपने सब संस्कार।
हर क्षेत्र में हर वक्त हम,नक़ल करने को है तैयार।
उठना बैठना अरु पहनावा,या फिर होवे बोलचाल।
बदल रहे है सब कुछ,आधुनिकता की लेकर ढाल।
आज समाज में भी इज्जत,हो रही है केवल धन से।
संस्कारो को छोड़ आज हम,कमाने में लगेहै मन से।
आचारविचार भी यही धन का ही रिश्ता जन जन से।
भले ही धन की खातिर,बहनों के पट ही उतरे तन से।
धन की खातिर आज प्रतिष्ठित भी लानत ले रहे है।
ऊँचे पदों पर बैठकर भी मात्रभूमि को  धोखा दे रहे है।
हर सुविधा अरु हर तरह की इज्जत यंहा पा रहे है।
फिर भी धन की खातिर वो शौक से गालिया खारहे है।
सामूहिक बलात्कार सिर्फ, हमको पश्चिम की देन नहीं।
खुद हम को ही आज किसी भी  कीमत पर चेन नहीं।
भौतिकवादी आज हम,खुद ही इतने ज्यादा बन चुके है।
भौतिक सुख की खातिर आज,सारे रिश्ते छन चुके है।
बेईमानी,गद्दारी,देशद्रोह या फिर हो  सामूहिक व्यभिचार।
जिम्मेदार स्वयंही है हम,भूल रहेजो अपने आचार विचार। 
  
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