Sunday, 20 April 2014

मक्कारों की नाव

चुनाव तो चुनाव है,बेकार,मक्कारो की नाव है/
जो किसी काम के नहीं होते,
वर्षोँ टिकिट को पांव हैं धोते,
टिकिट से नाव पर चढ़ जाते,
बेकारों में वो आगे बढ़ जाते,
जिनके सहारे आगे बढ़े,उनको ही देते घाव है/
चुनाव तो चुनाव … ..........
इसमे मतदाता भी है भाव खाता,
जाति,धर्म में एकता दिखलाता ,
जो भले सगे भाई से लट्ठ चलाता,
पर इसकी गफलत में आ जाता ,
खुद ही जीत रहे हों जैसे देते मूंछों पर ताव है/
चुनाव तो चुनाव। ..........
कुछ तो मत की कीमत लेते है,
प्रलोभन में अपना मत देते है,
भले बुरे का न कोई करे विचार,
कुछ तो भूले ही वैठे है अधिकार
बेकारों के भी इस तरह बढ़ा देते वो भाव है/
चुनाव तो चुनाव..............
एक बार जो चढ़ गया नाव,
फिर नहीं उसके मिलते भाव,
सात पीढ़ियाँ जाती है संवर ,
देश में चल रहा है यही भँवर,
जिसमे हर बार डूबती मतदाता की ही नाव है/
चुनाव तो चुनाव ………


 
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