Wednesday, 8 May 2013

सुख-दुःख

सुख और दुःख का कोई भौतिक स्वरूप नहीं होता, स्वार्थ पूर्ति से सुख का अनुभव होता है,और स्वार्थ पूर्ति न होने पर दुःख का अनुभव।अनापेक्षित बस्तु या सम्मान प्राप्ति का अत्यधिक सुख होता है।और अपेक्षित बस्तु या सम्मान न मिलने पर दुःख। जहा तक मैं समझ पाया हूँ,वो मैं एक छोटे से उदाहरण से व्यक्त करने की कोशिश कर रहा हूँ। किसी समय पर हम और आप कंही ऐसी राह पर फंस जाते है, कि वंहा कोई भी साधन उपलब्ध नहीं हो,सिवाय पैदल चलने के तेज धुप में। उसी वक्त अगर कोई साईकिल वाला व्यक्ति गुजरता है। और वो इस शर्त पर साईकिल पर अपन को बैठा लेता है, कि वो अपने को चलानी है वह बैठकर चलेगा। तब भी अपन उस व्यक्ति के आभारी होंगे, तथा साईकिल पर यात्रा में सुख का अनुभव करेंगे, साथ ही ईश्वर का धन्यबाद भी। कि वो साईकिल वाला मिला  दिया। अगले दिन उसी मार्ग पर,अपन लक्जरी कार में जा रहे हो और वो कार वाला हमें ये कह कर उतार दे, कि आप इस साईकिल पर बैठकर आजाओ, ये आदमी अकेला है ये साईकिल चला लायेगा, आप तो साथ के लिए बैठ आओ। तब उसी रास्ते पर वही रास्ता और साईकिल हमको सुख देने की वजाय दुःख का कारण बन जाती है।और हम ईश्वर को कोसते है कि कहाँ से वो मिल गया। मेरे विचार में साईकिल तथा रास्ता दोनों तो निर्जीव हैं, उनका स्वभाव तो स्थिर है बदलता नहीं। तो फिर दो बार में अलग अलग अनुभव हमारी अपनी मानसिकता का ही परिणाम है। अतः सुख और दुःख का कारण भौतिक बस्तुएं या  संसार नहीं, उसका कारण तो हमारा मानस है। आज की भौतिक सम्पन्नता की जो मारामारी चल रही है, जिसके लिए आज हम हर तरह के हथकंडे चाहे वो आर्थिक भ्रस्टाचार,बेईमानी हो या व्यभिचार,चरित्रहीनता को अपनाते जा रहे हैं। उससे हम कभी भी सुख की प्राप्ति नहीं कर सकते, भौतिक साधनों से संपन्न हो सकते है। चूँकि भौतिक जगत की कोई सीमा नहीं है, वो अनंत है। तो प्राप्त सम्पन्नता हमें सुखी नहीं कर सकती। क्योंकि जो हम प्राप्त कर चुके होंगे उससे आगे भी अन्य भौतिक बस्तु  होगी, जो अप्राप्त होगी। वही हमें दुःख देगी। अतः मेरे विचार से हमें भौतिक सम्पन्नता के लिए भी अपने समाज,परिवार और संस्कारों को सुरक्षित रखते हुए ही प्रयास करना चाहिए न कि हर कीमत पर।  
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