Friday, 30 March 2012

कृपया सोचिये

माँ की ममता जैसा जग में, कभी कुछ भी न रहा है.
निःस्वार्थ प्रेम है माँ का, विद्वानों ने भी यही कहा है.
अब तक पूत कपूत भले था,पर थी माता नहीं कुमाता.
 पर लगता है बदलता कुछ,  ममता को भी आज विधाता.
 खबरें पढ़कर आज जगत की, मन थोडा विचलित होता है.
लगता है ये विकसित मानव,अब मानवता को ही खोता है.
माँ की ममता भी अब यंहा पर, धन की खातिर खो रही है.
लगता है इसके बलबूते ही, आज सारी उन्नति हो रही है.
बच्चे को आज बचपन से ही, पाल रहा है पैसा ही,
बड़े होकर तो बच्चे भी, कर रहे हैं आचरण वैसा ही.
पैसे से पाली संतानें, ममता का मर्म किससे जानें.
जो देखा है सो करते हैं, सब भूल के जेबें भरते हैं.
धन्यवाद उनका फिर भी,कम से कम इतना करते हें.
माता के मरने पर तो,वो शोक सन्देश भी भिजवाते हैं.
शव यात्रा में आ न सकें, पर जायदाद को तो आजाते हैं.
वारिस खुद को सिद्ध करें, और नामांतरण करवाते हैं.  
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